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‘उदय हुआ है तो अस्त भी होगा’… मोहन भागवत के शब्दों में सत्ता के लिए कितना बड़ा संदेश? जानिए विस्तार से…

Mohan Bhagwat Ujjain: उज्जैन में युवा धर्म संसद से संघ प्रमुख ने अहंकार और सत्ता के भ्रम पर रखी बात, किसी नेता का नाम नहीं लिया; फिर भी राजनीतिक गलियारों में बयान के अलग-अलग अर्थ क्यों निकाले जा रहे हैं?

सत्ता का चरम अक्सर अपने साथ एक ऐसा भ्रम भी लेकर आता है, जिसमें व्यक्ति को लगने लगता है कि परिस्थितियां उसके नियंत्रण में हैं। फैसले उसी की इच्छा से होंगे, व्यवस्था उसी दिशा में चलेगी और उसके प्रभाव के सामने विरोध की आवाज कमजोर पड़ जाएगी। लेकिन राजनीति का इतिहास बताता है कि सत्ता स्थायी नहीं होती। समय बदलता है, परिस्थितियां बदलती हैं और सत्ता के केंद्र भी बदलते हैं।

धर्म संसद में बोले- मोहन भागवत

उज्जैन की युवा धर्म संसद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने इसी व्यापक संदर्भ में अहंकार, मनुष्य की सीमाओं और अपने नियंत्रण को लेकर बात की। उन्होंने कहा कि मनुष्य अपने अहंकार में यह मान लेता है कि सब कुछ उसकी इच्छा के अनुसार चलता है, जबकि प्रकृति और उसके नियम किसी व्यक्ति की इच्छा से नहीं बदलते। इसी क्रम में उदय और अस्त का उदाहरण सामने आया।

भागवत ने किसी नेता, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, राजनीतिक दल या सरकार का नाम नहीं लिया। यही इस बयान की सबसे महत्वपूर्ण बात है। इसके बावजूद राजनीति में इसे सत्ता और राजनीतिक प्रभाव के संदर्भ में पढ़ा जा रहा है। सवाल इसलिए भी बड़ा है- क्या यह केवल युवाओं को दिया गया दार्शनिक संदेश था या सत्ता के लिए भी इसमें कोई व्यापक संकेत छिपा है?

Mohan Bhagwat Ujjain:‘सब कुछ मेरी मर्जी से चलेगा’- यहीं से शुरू होता है अहंकार

भागवत के संबोधन का केंद्रीय विचार सत्ता से ज्यादा अहंकार और नियंत्रण के भ्रम से जुड़ा दिखाई देता है। इंसान जब सफलता हासिल करता है तो कई बार उसे लगने लगता है कि उसकी क्षमता ही हर परिणाम का कारण है। लेकिन भागवत की बात का सार यही है कि प्रकृति, समय और जीवन के नियम किसी व्यक्ति की इच्छा से नहीं चलते। सूर्य का उदय होना जितना निश्चित है, उसका अस्त होना भी उतना ही निश्चित है। यही बात जब सत्ता के संदर्भ में पढ़ी जाती है तो इसका अर्थ और व्यापक हो जाता है।

लोकतंत्र में सरकार मजबूत हो सकती है, नेतृत्व प्रभावशाली हो सकता है और किसी दल के पास बड़ा जनादेश हो सकता है, लेकिन इनमें से कोई भी स्थिति स्थायी नहीं होती। जनता का जनादेश बदल सकता है और राजनीतिक परिस्थितियां भी। इसलिए सत्ता के लिए सबसे बड़ा सवाल सिर्फ यह नहीं कि उसके पास कितनी शक्ति है, बल्कि यह भी है कि वह उस शक्ति को किस मानसिकता के साथ इस्तेमाल करती है।

भागवत ने नाम नहीं लिया, फिर राजनीतिक अर्थ क्यों निकले?

यहीं से बयान की दूसरी परत शुरू होती है। मोहन भागवत के शब्दों को राजनीतिक संदर्भ में पढ़ने वालों के पास अपनी-अपनी व्याख्या हो सकती है। खासकर ऐसे समय में जब राष्ट्रीय राजनीति में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखा राजनीतिक संघर्ष जारी रहता है, तब सत्ता, अहंकार और नियंत्रण जैसे शब्द स्वाभाविक रूप से राजनीतिक अर्थ ग्रहण कर लेते हैं।

लेकिन यहां तथ्य और व्याख्या के बीच अंतर रखना जरूरी है। भागवत ने किसी मौजूदा सरकार या नेता को निशाना बनाकर बयान नहीं दिया। उपलब्ध रिपोर्टों में भी उनके संबोधन का प्रमुख संदर्भ धर्म, अहंकार, आत्मबोध और युवाओं के जीवन में धर्म की भूमिका रहा है। इसलिए इसे सीधे किसी सरकार के खिलाफ संदेश कहना तथ्यात्मक निष्कर्ष नहीं, बल्कि राजनीतिक व्याख्या होगी।

Mohan Bhagwat Ujjain: विपक्ष के लिए भी उतना ही बड़ा सवाल

अगर इस बयान को विपक्षी राजनीति के संदर्भ में पढ़ा जाए तो तस्वीर दूसरी तरफ भी दिखाई देती है। विपक्ष का काम सरकार से सवाल पूछना, उसकी नीतियों की आलोचना करना और जनता से जुड़े मुद्दों को उठाना है। लेकिन राजनीति में आलोचना और सत्ता का अहंकार- दोनों एक-दूसरे के विकल्प नहीं हैं। विपक्ष में रहते हुए कोई नेता भी अपने राजनीतिक प्रभाव को स्थायी नहीं मान सकता।

यही वजह है कि ‘उदय और अस्त’ का संदेश अगर राजनीतिक अर्थ में पढ़ा जाए तो वह केवल सत्ता पक्ष के लिए नहीं, बल्कि हर उस राजनीतिक शक्ति के लिए है जो अपने प्रभाव को स्थायी समझने लगे। आज सत्ता में एक दल है, कल दूसरा हो सकता है। आज कोई नेता राजनीति के केंद्र में है, समय के साथ उसकी भूमिका बदल सकती है। लोकतंत्र में यही परिवर्तन उसकी मूल प्रकृति है।

क्या यह युवाओं के लिए संदेश ज्यादा था?

इस सवाल का जवाब भी महत्वपूर्ण है। युवा धर्म संसद का मंच मूलतः युवाओं के संवाद के लिए था। भागवत ने धर्म को केवल धार्मिक अनुष्ठान या जीवन के अंतिम पड़ाव से जोड़ने की धारणा से अलग बताया और युवाओं से धर्म को समझने तथा अपने जीवन में उसके अर्थ को देखने की बात कही।

उन्होंने धर्म को सत्य, करुणा, पवित्रता और आत्म-अनुशासन से जोड़ते हुए यह भी कहा कि युवा किसी विषय पर केवल सूचना और संदर्भों के आधार पर राय न बनाएं, बल्कि स्वयं विचार करें। इसलिए ‘उदय हुआ है तो अस्त भी होगा’ को केवल राजनीतिक तंज मान लेना शायद उस पूरे संबोधन को एक ही राजनीतिक चश्मे से देखने जैसा होगा।

Mohan Bhagwat Ujjain: लेकिन सत्ता के लिए इसमें संदेश क्यों पढ़ा जा रहा है?

क्योंकि सत्ता और अहंकार का संबंध राजनीति में नया नहीं है। सत्ता व्यक्ति को निर्णय लेने की क्षमता देती है, लेकिन वही शक्ति अगर असीमित समझ ली जाए तो लोकतांत्रिक संस्थाओं, असहमति और जनता के जनादेश की अहमियत कम समझे जाने का खतरा पैदा हो सकता है। भागवत के शब्दों को इसी व्यापक अर्थ में पढ़ें तो संदेश किसी एक सरकार के लिए नहीं, बल्कि सत्ता की मानसिकता के लिए दिखाई देता है। सत्ता जितनी बड़ी हो, उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी भी होती है। प्रभाव जितना व्यापक हो, आत्मसंयम की जरूरत भी उतनी ही अधिक होती है। और यही शायद ‘अहंकार’ वाली बात का राजनीतिक अर्थ है।

Mohan Bhagwat Ujjain
                                                        Mohan Bhagwat Ujjain
संघ प्रमुख के बयान और सरकार के बीच संबंध को कैसे देखें?

यहां भी सावधानी जरूरी है। आरएसएस और भाजपा के वैचारिक रिश्ते को लेकर सार्वजनिक जीवन में लंबे समय से चर्चा होती रही है। इसलिए संघ प्रमुख के किसी भी राजनीतिक रूप से संवेदनशील बयान को सत्ता के संदर्भ में पढ़ा जाना स्वाभाविक है। लेकिन किसी बयान की राजनीतिक व्याख्या और वक्ता की वास्तविक मंशा एक ही चीज नहीं होती। अगर वक्ता ने किसी का नाम नहीं लिया है तो केवल राजनीतिक संदर्भ के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि निशाना कौन था।

Mohan Bhagwat Ujjain: असली सवाल- सत्ता किसकी और कितने समय के लिए?

राजनीति में शायद यही इस पूरे बयान का सबसे बड़ा सवाल है। सत्ता किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं है। वह जनता के जनादेश से आती है। उसका प्रभाव चुनाव, परिस्थितियों और समय के साथ बदलता रहता है। इसलिए ‘उदय हुआ है तो अस्त भी होगा’ को अगर राजनीतिक संदर्भ में पढ़ा जाए तो इसका अर्थ किसी खास नेता के पतन की भविष्यवाणी करना नहीं, बल्कि सत्ता की अस्थायी प्रकृति को याद रखना है। यह संदेश आज सत्ता में बैठे व्यक्ति के लिए भी प्रासंगिक है और कल सत्ता में आने की कोशिश कर रहे विपक्षी नेता के लिए भी।

आखिर में…

मोहन भागवत ने उज्जैन में किसी का नाम नहीं लिया। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि उनका सीधा निशाना कोई खास नेता या सरकार थी। लेकिन उनके शब्दों ने सत्ता, अहंकार और स्थायित्व पर एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा किया है।

क्या राजनीतिक शक्ति मिलने के बाद कोई भी व्यक्ति यह मान सकता है कि परिस्थितियां हमेशा उसके नियंत्रण में रहेंगी? लोकतंत्र का अनुभव इसका जवाब देता है- सत्ता बदलती है, समीकरण बदलते हैं और समय का पहिया चलता रहता है। सूर्य का उदय जितना निश्चित है, उसका अस्त भी उतना ही निश्चित है। शायद भागवत के शब्दों को राजनीति के लिए पढ़ने का सबसे व्यापक अर्थ यही है- शक्ति मिले तो विनम्रता बनी रहे, प्रभाव मिले तो आत्मसंयम बना रहे और सत्ता मिले तो यह स्मरण भी बना रहे कि सत्ता स्वयं अंतिम सत्य नहीं है।

किसी खास सरकार के लिए यह संदेश था या नहीं, यह भागवत की मंशा जाने बिना तय नहीं किया जा सकता। लेकिन सत्ता में बैठे हर व्यक्ति के लिए सवाल जरूर बना रहता है। उदय के समय अगर अस्त का सत्य याद रहे, तो क्या सत्ता का चरित्र और अधिक जिम्मेदार नहीं हो जाएगा?

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