Home » मध्य प्रदेश » सतपुड़ा टाइगर रिजर्व बना वन्यजीवों के पुनर्वास की मिसाल, 25 बाघ और 3 तेंदुए लौटे जंगल

सतपुड़ा टाइगर रिजर्व बना वन्यजीवों के पुनर्वास की मिसाल, 25 बाघ और 3 तेंदुए लौटे जंगल

सतपुड़ा बना बाघ संरक्षण की मिसाल

Satpura Tiger Reserve: इंसान और वन्यजीवों के बीच बढ़ते संघर्ष के दौर में मध्य प्रदेश का सतपुड़ा टाइगर रिजर्व (एसटीआर) वन्यजीव संरक्षण की एक अनूठी मिसाल बनकर सामने आया है। यहां पिछले दस वर्षों से संचालित विशेष रिवाइल्डिंग सेंटर अनाथ, भटके हुए, उग्र स्वभाव वाले और मानव बस्तियों में पहुंचने वाले बाघों और तेंदुओं को दोबारा जंगल के अनुकूल बनाकर प्राकृतिक आवास में छोड़ने का काम कर रहे हैं। अब तक इन केंद्रों के माध्यम से 25 बाघों और 3 तेंदुओं का सफल पुनर्वास किया जा चुका है। यह पहल वन्यजीव संरक्षण के साथ-साथ मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण साबित हो रही है।

चूरना और मालिनी रेंज में बने हैं विशेष रिवाइल्डिंग सेंटर

सतपुड़ा टाइगर रिजर्व की फील्ड डायरेक्टर राखी नंदा ने बताया कि मध्य प्रदेश वन विभाग ने प्रदेश के चुनिंदा टाइगर रिजर्वों में ही ऐसी विशेष व्यवस्था विकसित की है। एसटीआर के चूरना रेंज में वर्ष 2017 में पहला रिवाइल्डिंग सेंटर बनाया गया था। इसकी सफलता के बाद दो-तीन वर्ष बाद मालिनी रेंज में दूसरा सेंटर भी तैयार किया गया। प्रदेश में कहीं भी कोई बाघ या तेंदुआ अनाथ हो जाए या मानव बस्तियों में पहुंचकर खतरा पैदा करे, तो रेस्क्यू टीम उसे इन केंद्रों में लाती है। यहां प्राकृतिक वातावरण में रखकर उन्हें फिर से जंगल के जीवन के लिए तैयार किया जाता है।

प्राकृतिक तरीके से सिखाया जाता है शिकार करना

रिवाइल्डिंग सेंटर में वन्यजीवों को पूरी तरह प्राकृतिक परिस्थितियों में रखा जाता है। उन्हें जीवित मुर्गी, बकरा, हिरण, सांभर और चीतल जैसे शिकार उपलब्ध कराए जाते हैं, ताकि उनकी प्राकृतिक शिकार क्षमता विकसित हो सके। उद्देश्य यह होता है कि जंगल में छोड़े जाने के बाद वे स्वयं भोजन जुटाने में सक्षम रहें और मानव बस्तियों की ओर न लौटें। हाल के वर्षों में अब्दुल्लागंज, बांधवगढ़, बालाघाट और पेंच टाइगर रिजर्व से लाए गए कई बाघ शावकों का भी सफल पुनर्वास किया गया है।

24 घंटे निगरानी और नियमित स्वास्थ्य परीक्षण

इन विशेष बाड़ों में वन्यजीवों की चौबीसों घंटे निगरानी की जाती है। स्थानीय स्तर पर दो चौकीदारों सहित पांच से छह सदस्यीय टीम लगातार उनकी गतिविधियों पर नजर रखती है। वन्यजीव अधिकारी समय-समय पर उनका स्वास्थ्य परीक्षण करते हैं। यदि कोई जानवर बीमार पड़ता है, तो उसका इलाज किया जाता है और गंभीर स्थिति होने पर ही उसे बाहर चिकित्सा सुविधा के लिए भेजा जाता है। जंगल में छोड़े जाने के बाद भी रेडियो कॉलर और अन्य तकनीकों के जरिए उनकी निगरानी जारी रहती है।

सुधार नहीं होने पर वन विहार भेजा जाता है

वन विभाग का लक्ष्य हर वन्यजीव को दोबारा स्वतंत्र और प्राकृतिक जीवन देना है। जब कोई बाघ या तेंदुआ पूरी तरह आत्मनिर्भर हो जाता है और मानव बस्तियों से दूर रहने योग्य साबित होता है, तब उसे जंगल में छोड़ दिया जाता है। हालांकि, यदि लंबे प्रयासों के बाद भी किसी वन्यजीव के व्यवहार में सुधार नहीं आता और उसका आक्रामक स्वभाव बना रहता है, तो अंतिम विकल्प के रूप में उसे भोपाल स्थित वन विहार राष्ट्रीय उद्यान भेजा जाता है। इस पूरी व्यवस्था ने सतपुड़ा टाइगर रिजर्व को वन्यजीव संरक्षण और पुनर्वास का एक सफल मॉडल बना दिया है।

Written by: Rashmi Sharma

यह भी पढ़े….साधु के वेश में संसद पहुंचे पप्पू यादव, दानपेटी लेकर राम मंदिर के कथित चढ़ावा मामले पर किया अनोखा प्रदर्शन