Uttarakhand News: यह विकास कैसा विकास? जब पहाड़ों में जीवन सुरक्षित नहीं रहेगा। आये दिन समाचार सुनने को मिल रहे हैं कि एक ही बरसात सारी उपजाऊ जमीन की मिट्टी बहा कर ले गई है। कल की ही बात है चार धाम यात्रा जोरों पर है; सामान्य तौर पर यही समय होता है, जब यात्रा पीक पर होती है। देश-विदेश से हर कोई यात्री गंगोत्री, यमनोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ जाने का मन बनाता है। यात्रा जोरों पर है। लाखों यात्री तीर्थ स्थानों की ओर जा रहे हैं; पर जिस तरह से बिना मौसम की बारिश ने यात्रियों को रात के 9 बजे सड़कों पर अंधेरे में भागने को मजबूर किया, पानी सड़कों पर तेजी से आया ,जिसने सड़कों को बड़े-बड़े पत्थरों से ढ़क दिया, वह हमारी कमी को दर्शाता है। सरकार में बैठे प्रबंधक किस तरह से यह प्रबंध कर रहे हैं ? केदारनाथ जाने के रास्ते मानसून के मौसम में ही नहीं, बगैर मानसून में थोड़ा-सा बारिस के आने से रास्ते रुक जाते हैं। इसी कारण तीर्थ यात्रा में बाधा पड़ रही है।
बांधों का निर्माण धरती को कमजोर करेगा!
नदियों से जल विद्युत का उत्पादन करने के लिए अंधाधुंद बांधों का निर्माण हो रहा है। भागीरथी और अलकनंदा नदियों के सीने को बांध कर बड़े-बड़े बांध बना दिये गये हैं; और अधिक बांधों का निर्माण कार्य चल रहा है। केंद्र सरकार चाहती है कि नदियों के पूरे पानी को रोक कर जल विद्युत का उत्पादन और किया जाय, लेकिन इससे होने वाले दुष्प्रभाव की ओर सरकार का ध्यान ही नहीं गया। अब जब सुप्रीम कोर्ट में इस बात पर याचिकाएं दायर हुईं, तब कोर्ट में शपथ पत्र दाखिल किये गये हैं कि हम जो 22 बांधों का निर्माण गंगा बेसिन पर कर रहे हैं, उसको सीमित कर रहे हैं। सिर्फ सात बांधों पर ही काम कर रहे हैं, क्योंकि उनके निर्माण कार्य पर काफी पैसा लग चुका है, उन्हें बंद करने से काफी पैसों का नुकसान होगा। अब जब कोर्ट का दबाव पड़ा, तब अन्य बांधों को बनाने से रोका गया। क्या इस तरह का काम बगैर सर्वेक्षण के किया गया। जबकि बड़ी-बड़ी परियोजनाओं को शुरू करने से पहले स्थान की गुणवत्ता के अलावा बहुत सारे कारकों पर ध्यान देने की जरूरत होती है। प्रोजक्ट को लंबी अवधि तक चलने के लिए सभी कारकों पर ध्यान देना चाहिए। उन बातों को क्यों नजरअंदाज किया गया।
Uttarakhand News: हिमालय अभी बन ही रहा है!
यह वैज्ञानिको को पता ही है कि हिमालय में परिवर्तन हो रहे हैं, पर्वत श्रृंखलाएं धीरे-धीरे ऊंची हो रही हैं। लगातार परिवर्तन का दौर हिमालय पर चल रहा है। इसी लिए इस क्षेत्र को भूकंपों का गढ़ कह सकते हैं। ऐसी अवस्था में कोई भी भारी निर्माण कार्य हिमालय की भूमि पर नहीं कर सकते। हिमालय पूरे देश का ही नहीं, सारे एशिया के मौसम पर प्रभाव डालता है। इसलिए इस क्षेत्र में बिना जानकारी के बड़े-बडे़ प्रोजक्ट लगाना, पूरे मौसम के बदलाव को छिन्न-भिन्न करना है।
सरकार जिन सात प्रोजक्ट को जारी रखना चाहती है, इनमें चार पहले से ही संचालित हो रहे हैं; इनमें टिहरी स्टेज द्वितीय 1000 मेगावाट, सिंगोल भटवाड़ी 99 मेगावाट, मदमहेश्वर 15 मेगावाट और काली गंगा द्वितीय 4.5 मेगावाट के हैं। और तीन तपोवन विष्णु गाड 520 मेगावाट, विष्णु गाड पीपलकोटी 444 मेगावाट और फाटा ब्युंग 76 मेगावाट के हैं यह सब लगभग तैयार हो चुके हैं।
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी निर्माण की स्थिति का शपथ-पत्र दाखिल किया है। अब आगे न्यायालय कैर्सा िनर्णय देगा, वह भविष्य बतायेगा। आज प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करना अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने-जैसा है। ऐसी स्थिति में विकास हो भी तो ऐसा हो, जो चिर स्थाई रहे। न प्रकृति का विनाश हो और न धरती से जीवजंतु मिटें। सबका साथ आवश्यक है।
लेखक: भगवती प्रसाद डोभाल
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