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त्वचा रोग केवल बाहरी समस्या नहीं, अंदरूनी असंतुलन का संकेत: आयुर्वेद से समझें सही देखभाल

Skin care:

Skin care: आज की बदलती जीवनशैली और असंतुलित खानपान के कारण त्वचा से जुड़े रोग तेजी से बढ़ते जा रहे हैं। पोषक तत्वों की कमी और लंबे समय तक गलत भोजन करने की आदत त्वचा संबंधी समस्याओं की बड़ी वजह बन रही है। खुजली, लाल चकत्ते, रैश और फंगल इंफेक्शन जैसी दिक्कतें अब आम हो चुकी हैं, लेकिन इनका समाधान केवल क्रीम या लोशन तक सीमित नहीं है।

आयुर्वेद के अनुसार, त्वचा पर दिखने वाली समस्याएं शरीर के अंदर चल रहे असंतुलन का संकेत होती हैं। हर त्वचा रोग एक जैसा नहीं होता और न ही हर स्थिति में एक ही उपचार प्रभावी होता है। इसलिए केवल बाहरी लेप से इलाज करने के बजाय रोग की जड़ तक पहुंचना जरूरी है।

अंदरुनी असंतुलन का असर त्वचा पर

आयुर्वेद में त्वचा रोगों को मुख्य रूप से रक्त की अशुद्धता और पित्त दोष के असंतुलन से जोड़ा गया है। जब शरीर के भीतर ये दोष बढ़ते हैं, तो उनका प्रभाव सीधे त्वचा पर दिखाई देता है। आधुनिक दवाएं और एलर्जी की गोलियां कुछ समय के लिए राहत दे सकती हैं, लेकिन समस्या बार-बार लौट आती है।

Skin care: शुरुआती समस्या में बाहरी देखभाल

अगर खुजली या हल्का फंगल संक्रमण शुरुआती अवस्था में है, तो नारियल तेल में भीम कपूर मिलाकर लगाने से आराम मिल सकता है। यह उपाय खुजली को कम करता है और संक्रमण को फैलने से रोकता है।

Skin care: पुरानी और बार-बार होने वाली समस्या का इलाज

पुरानी खुजली, दाद, फंगल इंफेक्शन या बार-बार उभरने वाले चकत्तों के लिए आयुर्वेद में जड़ी-बूटी युक्त लेप की सलाह दी जाती है। नारियल तेल में नीम तेल, भीम कपूर, मंजिष्ठा चूर्ण, हरीतकी चूर्ण और हल्दी मिलाकर सोने से पहले लगाने से खुजली, लालिमा और संक्रमण में कमी आती है।

रक्त शोधन है असली इलाज

आयुर्वेद में माना गया है कि त्वचा रोगों का स्थायी समाधान अंदरूनी सफाई से ही संभव है। रक्त शोधन के लिए खदिरारिष्ट का सेवन लाभकारी माना जाता है। यह बाजार में आसानी से उपलब्ध है, लेकिन इसका सेवन चिकित्सक की सलाह से ही करना चाहिए।आयुर्वेद का संदेश साफ है त्वचा की देखभाल सिर्फ बाहर से नहीं, बल्कि अंदर से भी जरूरी है। सही खानपान, जीवनशैली में सुधार और उचित आयुर्वेदिक उपचार अपनाकर त्वचा रोगों से लंबे समय तक राहत पाई जा सकती है।

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