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कार्यकाल खत्म, फिर भी इंटरनेट मीडिया पर ‘मुख्यमंत्री’ बनी रहीं ममता

Mamata Banerjee:

Mamata Banerjee: पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की चुनावी हार और विधानसभा भंग होने के बाद भी ममता बनर्जी के इंटरनेट मीडिया प्रोफाइल को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। राज्य सरकार का कार्यकाल समाप्त हो चुका है और आधिकारिक रूप से विधानसभा भी भंग कर दी गई है, लेकिन इसके बावजूद ममता बनर्जी ने अभी तक अपने सोशल मीडिया खातों से ‘मुख्यमंत्री’ का पद नहीं हटाया है। इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। विपक्षी दल इसे लेकर सवाल उठा रहे हैं, जबकि तृणमूल कांग्रेस की ओर से अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

विधानसभा भंग होने के बाद भी नहीं बदला परिचय

जानकारी के मुताबिक पश्चिम बंगाल की पूर्ववर्ती सरकार का कार्यकाल बीते गुरुवार को समाप्त हो गया था। आधिकारिक रूप से सात मई तक ही सरकार का कार्यकाल मान्य था। इसके बाद रात में राज्यपाल आरएन रवि ने पश्चिम बंगाल की 17वीं विधानसभा को भंग करने की अधिसूचना जारी कर दी। इस फैसले के साथ ही राज्य की विधानसभा का अस्तित्व समाप्त हो गया और नई सरकार गठन की प्रक्रिया शुरू हो गई। हालांकि, राजनीतिक और संवैधानिक बदलावों के बावजूद ममता बनर्जी के सोशल मीडिया प्रोफाइल में किसी तरह का परिवर्तन नहीं किया गया। फेसबुक, इंस्टाग्राम और एक्स जैसे मंचों पर अब भी उनके परिचय में उन्हें पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बताया जा रहा है।

Mamata Banerjee: इंटरनेट मीडिया प्रोफाइल पर बना हुआ पुराना पद

ममता बनर्जी के आधिकारिक इंटरनेट मीडिया खातों में उनकी तस्वीर के नीचे दो परिचय दिए गए हैं। पहला परिचय उन्हें तृणमूल कांग्रेस की संस्थापक और चेयरपर्सन के रूप में दर्शाता है, जबकि दूसरा परिचय अब भी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री के रूप में दिखाई दे रहा है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि विधानसभा भंग होने और सरकार का कार्यकाल समाप्त होने के बाद ऐसे पदनामों में बदलाव किया जाना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा माना जाता है। यही वजह है कि इस मामले ने राजनीतिक बहस को जन्म दे दिया है।

विपक्ष ने उठाए सवाल

विपक्षी दलों का कहना है कि जब राज्य में सरकार का कार्यकाल समाप्त हो चुका है और नई सरकार गठन की प्रक्रिया शुरू हो गई है, तब भी खुद को मुख्यमंत्री बताना उचित नहीं माना जा सकता। भाजपा नेताओं ने इस मुद्दे को राजनीतिक शिष्टाचार और संवैधानिक मर्यादा से जोड़ते हुए सवाल खड़े किए हैं। दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस के नेताओं की ओर से इस विवाद पर अभी तक कोई स्पष्ट बयान सामने नहीं आया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा बंगाल की राजनीति में और अधिक चर्चा का विषय बन सकता है।

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