UP Election 2027: उत्तर प्रदेश की सियासत में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक करवट दिखाई देने लगी है। भाजपा के ’80 बनाम 20′ हिंदुत्व नैरेटिव की काट में समाजवादी पार्टी अब पीडीए के साथ ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ का नैरेटिव गढ़ने में जुटी हुई है। मंदिर, धर्म और हिंदू आस्था से जुड़े मुद्दों पर सपा का बदला हुआ रुख संकेत दे रहा है कि पार्टी भाजपा के सबसे मजबूत राजनीतिक हथियार को उसी मैदान में चुनौती देने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है।
सपा अपने पारंपरिक वोट बैंक के साथ…
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले विधानसभा चुनाव में सपा अपने पारंपरिक वोट बैंक के साथ ही अन्य वर्गों के मतदाताओं के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने की कोशिश कर रही है। पार्टी की रणनीति भी इसी दिशा में दिखाई दे रही है। पीडीए के सामाजिक समीकरण को मजबूत करने के साथ मंदिर, सनातन, संत समाज और सांस्कृतिक मुद्दों पर सक्रियता को इसी राजनीतिक विस्तार की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। मेरठ में जहां मुख्यमंत्री ने कांवड़ियों पर पुष्पवर्षा कर उनका स्वागत किया, वहीं समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने भी हाईवे पर शिवभक्त कांवड़ यात्रियों पर फूल बरसाकर उनका अभिनंदन किया। इस दौरान सपा कार्यकर्ताओं ने कहा कि भगवान भोलेनाथ सभी शिवभक्तों की यात्रा को मंगलमय करें। वहीं, सरधना से सपा विधायक अतुल प्रधान भी लगातार कांवड़ियों की सेवा करते नजर आ रहे हैं।
UP Election 2027: पीडीए के राजनीतिक आधार तक सीमित
राजनीतिक विश्लेषक वीरेंद्र सिंह रावत ने कहा कि समाजवादी पार्टी अब केवल अपने पारंपरिक सामाजिक न्याय और पीडीए के राजनीतिक आधार तक सीमित रहने के बजाय हिंदू आस्था, सनातन और सांस्कृतिक मुद्दों को भी राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला रही है। अखिलेश यादव की मंदिरों में बढ़ती सक्रियता, संतों और धर्माचार्यों से मुलाकात तथा धार्मिक मुद्दों पर मुखरता इसी बदली हुई रणनीति का संकेत है। उन्होंने कहा कि इटावा में केदारनाथ की तर्ज पर केदारेश्वर मंदिर का निर्माण, सपा कार्यालय के बाहर ‘सनातन ही समाजवाद है’ जैसे पोस्टर और भगवान परशुराम से जुड़े कार्यक्रमों के जरिए ब्राह्मण समाज को साधने की कोशिश पार्टी की राजनीति में आए इस बदलाव को और स्पष्ट करती है। उन्होंने कहा कि ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से अखिलेश यादव की मुलाकात और इसके बाद धार्मिक मुद्दों को लेकर सरकार पर हमलावर होना भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है। इसी क्रम में अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे से जुड़ी कथित गड़बड़ी के मुद्दे को सपा की ओर से प्रमुखता से उठाना भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
एक सीमित सामाजिक समीकरण पर्याप्त नहीं
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक रतन मणि लाल का मानना है कि समाजवादी पार्टी पिछले एक-दो वर्षों से अपने पारंपरिक ‘एमवाई’ समीकरण से आगे निकलकर व्यापक सामाजिक आधार तैयार करने की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा कि अखिलेश यादव को यह एहसास हो गया है कि सत्ता तक पहुंचने के लिए केवल एक सीमित सामाजिक समीकरण पर्याप्त नहीं है। भाजपा ने व्यापक हिंदुत्व के आधार पर हिंदू समाज के अलग-अलग वर्गों को एक राजनीतिक छतरी के नीचे जोड़ने में सफलता हासिल की है और सपा अब उसी व्यापक सामाजिक आधार में अपनी जगह बनाने की कोशिश करती दिखाई दे रही है। उन्होंने कहा कि पार्टी की व्यापक रणनीति यह संदेश देने की है कि हिंदुत्व या हिंदू आस्था पर किसी एक राजनीतिक दल का एकाधिकार नहीं है और समाजवादी पार्टी भी हिंदू समाज की आस्था और परंपराओं से अलग नहीं है। इसे सपा के ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की ओर बढ़ते कदम के तौर पर देखा जा सकता है। वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक राजीव श्रीवास्तव ने कहा कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में पिछले तीन-चार दशकों से जाति और धर्म दो प्रमुख आधार रहे हैं।
2014 के बाद भाजपा ने हिंदू वोटों के एकत्रीकरण की राजनीति को मजबूत किया, जिसका उसे लाभ भी मिला। हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनाव में जातीय समीकरण फिर प्रभावी हुआ और सपा-कांग्रेस को इसका फायदा मिला। अब भाजपा के हिंदुत्व की काट के लिए दूसरे दलों के सामने बहुसंख्यक हिंदू मतदाताओं को साधने की चुनौती है। ऐसे में सॉफ्ट हिंदुत्व से पूरी तरह दूरी बनाकर भाजपा के आक्रामक हिंदुत्व का मुकाबला करना मुश्किल होगा। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता अवनीश त्यागी ने कहा कि सपा भी कांग्रेस की तरह केवल दिखावे की राजनीति करती है। सनातन और हिंदू धर्म से उसका कोई वास्तविक सरोकार नहीं है। चुनावी लाभ के लिए सपा अब हिंदू आस्था के प्रति अपना रुख बदलने का दिखावा कर रही है, जबकि उसका अतीत सनातन विरोधी रहा है।
समाजवादी पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता अशोक यादव ने कहा कि भाजपा सनातन को राजनीतिक औजार के तौर पर इस्तेमाल कर रही है। सनातन भेदभाव और नफरत नहीं, बल्कि प्रेम, सद्भाव और समावेशिता की बात करता है। हम भाजपा के इस छद्म और नफरती सनातन के विरोधी हैं, सनातन के नहीं। हमारा सनातन स्वामी विवेकानंद का समावेशी सनातन है।








