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क्या अपना जेट सच में किराये से सस्ता पड़ेगा? MP सरकार के नए विमान का पूरा हिसाब

MOHAN YADAV HELICOPTER

MP HELICOPTER NEWS: मध्य प्रदेश सरकार का नया Bombardier Challenger 3500 बिजनेस जेट मुख्यमंत्री और दूसरे वीआईपी की हवाई यात्राओं के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। सरकार के सामने अपना विमान खरीदने का तर्क यह है कि पिछले कुछ वर्षों में वीआईपी यात्राओं के लिए विमान और हेलीकॉप्टर किराये पर लेने में बड़ी रकम खर्च हुई है। लेकिन सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि सरकार ने जेट कितने करोड़ में खरीदा। अपना विमान आने के बाद भी पायलट, ईंधन, मेंटेनेंस, बीमा, हैंगर और दूसरे संचालन खर्च होंगे। कुछ जगहों पर रनवे की क्षमता बढ़ाने की जरूरत भी पड़ सकती है। तो क्या अपना जेट वाकई किराये के विमान से सस्ता पड़ेगा? इसे आठ सवालों में समझिए।

सवाल 1: अपना जेट खरीदने की नौबत क्यों आई?

मध्य प्रदेश सरकार के पास पहले अपना विमान था। 6 मई 2021 को राज्य सरकार का Beechcraft King Air B-200GT ग्वालियर एयरबेस पर लैंडिंग के दौरान दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। यह विमान 2020 में करीब ₹65 करोड़ में खरीदा गया था। हादसे के बाद विमान संचालन से जुड़ी जांच हुई और DGCA ने संबंधित पायलट का लाइसेंस एक साल के लिए निलंबित किया। विमान का बीमा नहीं होने के कारण सरकार को इसकी पूरी कीमत की भरपाई नहीं मिल सकी। बाद में इसे बेचने के लिए करीब ₹7 करोड़ की रिजर्व कीमत रखे जाने की जानकारी सामने आई। इसके बाद राज्य को मुख्यमंत्री, राज्यपाल और दूसरे वीआईपी दौरों के लिए निजी विमान और हेलीकॉप्टर किराये पर लेने पड़े। यहीं से अपना विमान खरीदने का तर्क मजबूत हुआ- अगर लंबे समय तक चार्टर विमान लेना ही है तो क्या सरकार का अपना विमान रखना ज्यादा व्यावहारिक होगा?

MP HELICOPTER NEWS: सवाल 2: किराये पर सरकार अब तक कितना पैसा खर्च कर चुकी है?

यही आंकड़ा इस पूरी कहानी का आधार है। विधानसभा में सामने आए आंकड़ों के मुताबिक, जनवरी 2021 से नवंबर 2025 के बीच मध्य प्रदेश सरकार ने विमान और हेलीकॉप्टर किराये पर करीब ₹290 करोड़ खर्च किए। 2025 में नवंबर तक ही यह खर्च ₹90 करोड़ से ज्यादा पहुंच गया था। वहीं जनवरी 2024 से नवंबर 2025 के बीच करीब ₹143 करोड़ खर्च होने की जानकारी सामने आई। यानी सरकार का हवाई यात्रा खर्च पिछले कुछ वर्षों में काफी बढ़ा है। ₹290 करोड़ को सिर्फ जेट के किराये का खर्च नहीं माना जा सकता, क्योंकि इसमें हेलीकॉप्टर का किराया भी शामिल है।

सवाल 3: ₹233 करोड़ का जेट आखिर ₹350 करोड़ तक कैसे पहुंचा?

Challenger 3500 की कीमत को लेकर अलग-अलग आंकड़े सामने आए हैं। 2024 में सरकार की मंजूरी के समय विमान की कीमत करीब ₹233 करोड़ बताई गई थी। बाद की जानकारी में टैक्स, परिवहन और दूसरे खर्चों को जोड़कर कुल लागत करीब ₹350 करोड़ तक बताई गई। एक तरफ विमान की मूल खरीद कीमत है और दूसरी तरफ टैक्स, डिलीवरी, परिवहन तथा दूसरे खर्चों को जोड़कर बनने वाली कुल लागत। इसीलिए इस जेट की कीमत को समझते समय यह देखना जरूरी है कि रिपोर्ट में सिर्फ विमान की कीमत बताई जा रही है या पूरी डील की अनुमानित लागत।

MP HELICOPTER NEWS: सवाल 4: अपना विमान चलाने का सालाना खर्च कितना होगा?

यहीं पर अपना जेट और किराये का विमान के बीच असली अंतर सामने आता है। अपना विमान खरीद लेने के बाद खर्च खत्म नहीं होता। इसके लिए पायलट और क्रू, हैंगर, बीमा, नियमित मेंटेनेंस, ईंधन, प्रशिक्षण और दूसरे संचालन खर्च लगातार होते हैं। Challenger 3500 को साल में करीब 450 घंटे उड़ाने पर स्थायी खर्च और संचालन लागत मिलाकर करीब ₹30-33 करोड़ सालाना बैठ सकती है। 200 घंटे की उड़ान पर यह अनुमान करीब ₹18-19 करोड़ बताया गया है। लेकिन यह ध्यान रखना जरूरी है कि ये आंकड़े अमेरिकी बाजार के अनुमान पर आधारित हैं। मध्य प्रदेश सरकार का वास्तविक खर्च इससे अलग हो सकता है। इसलिए जेट की खरीद कीमत के साथ उसका लाइफ-साइकिल कॉस्ट देखना ज्यादा जरूरी है।

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सवाल 5: किराये और अपने जेट में प्रति घंटे कितना अंतर है?

2024 में सरकार द्वारा किराये पर लिए जाने वाले विमानों की दर करीब ₹4.75 लाख से ₹5.70 लाख प्रति घंटा थी। वहीं 450 घंटे सालाना उड़ान के आधार पर अपने Challenger 3500 की अनुमानित कुल लागत करीब ₹30-33 करोड़ मानें तो प्रति उड़ान घंटा लागत लगभग ₹6.7-7.3 लाख के आसपास बैठ सकती है। यानी सिर्फ उड़ान घंटे का हिसाब लगाएं तो अपना जेट जरूरी नहीं कि किराये से सस्ता दिखे। लेकिन यहीं एक और खर्च महत्वपूर्ण हो जाता है- किराये के विमान को उपलब्ध रखने के लिए होने वाला स्टैंडिंग चार्ज। अगर किराये के विमान के लिए बिना उड़ान के भी बड़ी रकम देनी पड़ती है और अपना विमान आने के बाद यह खर्च काफी कम हो जाता है, तो पूरा गणित बदल सकता है।

MP HELICOPTER NEWS: सवाल 6: जेट कम इस्तेमाल हुआ तो क्या होगा?

यह अपना विमान खरीदने के फैसले का सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। किराये के विमान में जरूरत के हिसाब से घंटे खरीदे जा सकते हैं। लेकिन अपना विमान कम उड़ने पर भी उसके कुछ खर्च चलते रहते हैं। पायलट, बीमा, हैंगर, रखरखाव और विमान को ऑपरेशनल स्थिति में रखने का खर्च पूरी तरह खत्म नहीं होता। मान लीजिए विमान साल में 450 घंटे उड़ता है तो खर्च को ज्यादा उड़ान घंटों में बांटा जा सकता है। लेकिन अगर उपयोग काफी कम हो गया तो प्रति उड़ान घंटे की वास्तविक लागत बढ़ सकती है। यानी अपना जेट तभी ज्यादा उपयोगी दिख सकता है जब उसका पर्याप्त इस्तेमाल हो। इसीलिए आने वाले वर्षों में विमान के वास्तविक उड़ान घंटे इस पूरी खरीद की आर्थिक तस्वीर समझने के लिए सबसे अहम आंकड़ा होंगे।

सवाल 7: क्या अपना जेट आने के बाद भी सरकार को विमान किराये पर लेना पड़ेगा?

जरूरी नहीं कि अपना जेट आने के बाद चार्टर विमान की जरूरत पूरी तरह खत्म हो जाए। Challenger 3500 हर एयरपोर्ट या हर हवाई पट्टी पर नहीं उतर सकता। रनवे की लंबाई, मौसम, विमान का वजन और एयरपोर्ट की दूसरी तकनीकी सुविधाएं भी महत्वपूर्ण होती हैं। मध्य प्रदेश में कई हवाई पट्टियों को बड़े विमानों के संचालन के लिहाज से विकसित करने की जरूरत बताई गई है। यानी सरकार के पास अपना जेट होने के बावजूद कुछ यात्राओं के लिए दूसरे विमान या हेलीकॉप्टर की जरूरत बनी रह सकती है।यही वजह है कि ₹290 करोड़ के पुराने किराये के खर्च को पूरी तरह खत्म होने वाला खर्च मानना सही नहीं होगा।

MP HELICOPTER NEWS: सवाल 8: तो आखिर इस खरीद से सरकार को कितनी बचत हो सकती है?

बचत मुख्य रूप से चार चीजों पर निर्भर करेगी- पहला, जेट साल में कितने घंटे उड़ता है। दूसरा, कितनी वीआईपी यात्राएं चार्टर विमान के बजाय सरकारी जेट से होने लगती हैं।तीसरा, विमान का वास्तविक सालाना संचालन और मेंटेनेंस खर्च कितना रहता है। चौथा, जेट के साथ जरूरी रनवे, हैंगर और दूसरे एविएशन इंफ्रास्ट्रक्चर पर कितना अतिरिक्त खर्च होता है। यानी गणित सिर्फ इतना नहीं है कि सरकार पहले किराये पर ₹5 लाख प्रति घंटा दे रही थी और अब अपना विमान है।

आखिर अपना जेट सस्ता पड़ेगा या नहीं?

पिछले वर्षों में चार्टर विमान और हेलीकॉप्टर पर सरकार ने बड़ी रकम खर्च की है। दूसरी तरफ अपना जेट रखने पर भी हर साल करोड़ों रुपये के संचालन खर्च की जरूरत होगी। इसलिए असली सवाल “अपना जेट महंगा है या सस्ता?” से ज्यादा यह है कि सरकार उसका कितना इस्तेमाल करती है और उससे किराये के विमान की जरूरत कितनी कम होती है।

अगर सरकारी जेट का पर्याप्त इस्तेमाल होता है और चार्टर पर होने वाला खर्च बड़े स्तर पर घटता है, तो लंबे समय में तस्वीर अलग हो सकती है। लेकिन अगर विमान कम उड़ता है और संचालन लागत बनी रहती है, तो प्रति उड़ान घंटे की लागत बढ़ सकती है। इसलिए इस खरीद का असली हिसाब विमान खरीदने के दिन नहीं, बल्कि उसके अगले कई वर्षों के इस्तेमाल और खर्च से सामने आएगा।

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