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SC/ST Act के दुरुपयोग पर फिर बहस, 23 लाख की राहत ने खड़े किए सवाल; लेकिन कानून को लेकर तस्वीर इतनी सीधी नहीं

SC/ST Act Misuse:

SC/ST Act Misuse: SC/ST Act एक बार फिर चर्चा में है। इस बार वजह इलाहाबाद हाईकोर्ट में हुई सुनवाई है, जहाँ एक परिवार से जुड़े अलग-अलग मामलों में SC/ST Act के तहत मिली आर्थिक सहायता का आँकड़ा सामने आया। अदालत को बताया गया कि परिवार के सदस्यों को अलग-अलग मामलों में करीब 23.36 लाख रुपये की राहत मिल चुकी है। इसके अलावा कई और मामलों में राहत के दावे लंबित बताए गए। मामले को गंभीरता से लेते हुए हाईकोर्ट ने पूरे घटनाक्रम की जाँच के निर्देश दिए हैं। हालाँकि, अदालत ने साथ ही एक अहम बात कही है- सिर्फ किसी व्यक्ति या परिवार के खिलाफ कई मुकदमे दर्ज होने से यह नहीं माना जा सकता कि सभी मामले फर्जी हैं। यही बात इस पूरे विवाद को समझने के लिए सबसे जरूरी है।

SC/ST Act Misuse: जानिए क्यों बना SC/ST Act-

SC/ST Act साल 1989 में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों के खिलाफ होने वाले अत्याचार और जाति आधारित अपराधों से निपटने के लिए बनाया गया था। इस कानून में कई अपराधों के लिए सजा का प्रावधान है। साथ ही, अत्याचार के शिकार व्यक्ति और उसके परिवार को राहत और आर्थिक सहायता देने की व्यवस्था भी है। यानी कानून का मकसद सिर्फ आरोपी को सजा दिलाना नहीं, बल्कि पीड़ित को मुश्किल समय में सरकारी सहायता देना भी है।

SC/ST Act Misuse: फिर दुरुपयोग का सवाल कहाँ से आता है-

किसी भी कानून की तरह SC/ST Act के इस्तेमाल को लेकर भी समय-समय पर शिकायतें सामने आती रही हैं। आरोप यह लगाया जाता है कि कुछ मामलों में व्यक्तिगत विवाद या दुश्मनी को जातिगत अपराध का रूप देखकर कानून का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन यहाँ एक फर्क समझना भी जरूरी है।

FIR दर्ज होना और आरोप साबित होना एक ही बात नहीं है। पुलिस जाँच के बाद मामला अदालत तक पहुँचता है और फिर सबूतों के आधार पर कोर्ट तय करती है कि आरोप साबित हुए या नहीं। इसलिए किसी केस में आरोपी के बरी होने भर से यह अपने आप साबित नहीं होता कि शिकायतकर्ता ने जानबूझकर झूठा मुकदमा दर्ज कराया था।

23 लाख रुपये के मामले में हाईकोर्ट ने क्या कहा-

इलाहाबाद हाईकोर्ट के सामने सुनवाई के दौरान परिवार को अलग-अलग मामलों में मिली आर्थिक सहायता का विवरण रखा गया। कुल रकम 23,36,250 रुपये बताई गई। अदालत ने इस पूरे मामले की जाँच के आदेश दिए हैं। लेकिन कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल कई मामलों में राहत मिलना या एक परिवार के कई सदस्यों के खिलाफ/द्वारा मुकदमों का होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि मुकदमे फर्जी थे। इसलिए अभी इस मामले में अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।

चंद्रावती मामले में भी उठे थे सवाल-

SC/ST Act के कथित दुरुपयोग की चर्चा में उत्तर प्रदेश का चंद्रावती देवी से जुड़ा मामला भी अक्सर सामने आता है। इस मामले में एक परिवार से जुड़े कई मुकदमों और सरकारी राहत को लेकर सवाल उठाए गए थे। बड़ी रकम राहत के तौर पर मिलने के दावे भी सामने आए। हालाँकि, इस तरह के मामलों में आरोप और अदालत से साबित तथ्य के बीच अंतर करना जरूरी है। किसी व्यक्ति पर फर्जी मुकदमे कराने या सरकारी पैसा गलत तरीके से लेने का आरोप लगना और अदालत में वह आरोप साबित होना दो अलग बातें हैं।

यदि फर्जी केस साबित हो जाए तो क्या होगा-

अगर जाँच और न्यायिक प्रक्रिया में यह साबित होता है कि किसी व्यक्ति ने जानबूझकर किसी निर्दोष के खिलाफ झूठा आपराधिक मामला दर्ज कराया, तो उसके खिलाफ अलग कानूनी कार्रवाई हो सकती है। भारतीय न्याय संहिता यानी BNS की धारा 248 झूठा आपराधिक आरोप लगाने से संबंधित है। सामान्य मामले में इसमें पाँच साल तक की सजा, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है। गंभीर अपराध का झूठा आरोप लगाने की स्थिति में सजा 10 साल तक हो सकती है। लेकिन सिर्फ आरोपी के बरी होने से शिकायतकर्ता पर यह धारा अपने आप नहीं लग जाती। यह साबित करना जरूरी होता है कि आरोप जानबूझकर झूठा लगाया गया था।

विष्णु तिवारी का मामला क्यों सुर्खियों में-

इस बहस में विष्णु तिवारी का नाम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उनका मामला बताता है कि किसी व्यक्ति को अगर लंबे समय तक जेल में रहना पड़े और बाद में वह बरी हो जाए, तो उसके जीवन पर उसका असर कितना गहरा हो सकता है। विष्णु तिवारी करीब 20 साल जेल में रहे। 2021 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया। जब वह जेल गए थे, तब उनकी उम्र करीब 23 साल थी। जब बाहर आए तो उम्र 40 के पार हो चुकी थी। इस दौरान उनके माता-पिता और भाइयों की मौत हो गई। वह अपने परिवार के कई अहम मौकों पर मौजूद नहीं रह सके। कोर्ट से बरी होने के बाद उन्हें आजादी तो मिली, लेकिन बीते हुए 20 साल वापस नहीं मिले।

बहस कानून की नहीं, उसके इस्तेमाल की भी है-

SC/ST Act की जरूरत को लेकर कोई दो राय नहीं है। जातिगत अत्याचार के मामलों में पीड़ितों को मजबूत कानूनी सुरक्षा मिलना जरूरी है। लेकिन साथ ही यह सवाल भी जरूरी है कि अगर किसी मामले में कानून का जानबूझकर गलत इस्तेमाल होता है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई कैसे होगी। इसलिए बहस का रास्ता यह नहीं होना चाहिए कि SC/ST Act ही गलत है। असली सवाल यह है कि वास्तविक पीड़ित को न्याय मिले और अगर कोई कानून का गलत इस्तेमाल करता है, तो उसे भी कानून के दायरे में लाया जाए। हालिया इलाहाबाद हाईकोर्ट की सुनवाई ने इसी सवाल को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है

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