UP Politics: उत्तर प्रदेश की राजनीति में चुनाव से पहले नेताओं का पाला बदलना कोई नई बात नहीं है। अलग-अलग दल सामाजिक और जातीय समीकरण साधने के लिए दूसरे दलों के प्रभावशाली नेताओं को अपने साथ जोड़ने की कोशिश करते हैं। हाल ही में सैयद आसिम वकार के AIMIM छोड़कर कांग्रेस में शामिल होने के बाद एक बार फिर दलबदल और उसके चुनावी असर को लेकर चर्चा तेज हो गई है। हालांकि, सवाल यह है कि किसी नेता के पार्टी बदलने से क्या उसका समर्थक वोट बैंक भी उसी दिशा में चला जाता है? पिछले विधानसभा चुनावों के आंकड़े बताते हैं कि दलबदलू नेताओं की सफलता कई दूसरे कारकों पर भी निर्भर करती है।
2022 में दलबदलुओं का प्रदर्शन रहा कमजोर
2022 के विधानसभा चुनाव में करीब 206 उम्मीदवार ऐसे थे, जिन्होंने चुनाव से पहले या अलग-अलग चरणों में पार्टियां बदली थीं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इनमें से लगभग हर पांच में से केवल एक उम्मीदवार ही चुनाव जीत सका। चुनाव से पहले बीजेपी छोड़कर सपा में जाने वाले स्वामी प्रसाद मौर्य, धर्म सिंह सैनी और दारा सिंह चौहान प्रमुख नाम थे। मौर्य और सैनी चुनाव हार गए, जबकि चौहान घोसी से जीतने में सफल रहे। हालांकि, बाद में उन्होंने विधायक पद से इस्तीफा देकर बीजेपी में वापसी कर ली। इसी तरह इमरान मसूद भी कांग्रेस छोड़कर सपा में गए, लेकिन उन्हें विधानसभा चुनाव का टिकट नहीं मिला।
UP Politics: 2017 में बीजेपी के दलबदलुओं ने दिखाया दम
दलबदलुओं की सफलता हर चुनाव में एक जैसी नहीं रही है। 2017 में बीजेपी ने 65 दलबदलू नेताओं को टिकट दिया था, जिनमें 52 चुनाव जीतने में सफल रहे। यानी उनकी सफलता दर करीब 80 फीसदी रही। इसके मुकाबले सपा के 26 दलबदलू उम्मीदवारों में केवल 3 और BSP के 29 में सिर्फ 2 उम्मीदवार जीत सके। 2012 में सपा के 32 दलबदलुओं में 14 जीते, जबकि 2007 में BSP के 44 दलबदलू उम्मीदवारों में 27 विजयी हुए।
पार्टी का वोट बैंक नेता से ज्यादा मजबूत
इन आंकड़ों से संकेत मिलता है कि दलबदलू नेता अपने साथ पूरा वोट बैंक ट्रांसफर नहीं कराते। मतदाता पार्टी, नेतृत्व, जातीय समीकरण, स्थानीय उम्मीदवार और सरकार के प्रदर्शन को भी ध्यान में रखते हैं। 2022 में बीजेपी से सपा में गए बड़े नेताओं के बावजूद बीजेपी ने 2017 में जीती 232 सीटों में से बड़ी संख्या बरकरार रखी। कुल 274 सीटों पर पिछली बार वाली पार्टी ही दोबारा जीती। इससे पता चलता है कि कई बार पार्टी का संगठन और मजबूत वोट बेस किसी एक नेता के व्यक्तिगत प्रभाव से ज्यादा निर्णायक होता है।
UP Politics: 2027 में obi-दलित और क्षेत्रीय नेताओं पर नजर
2027 विधानसभा चुनाव को लेकर यूपी में राजनीतिक गतिविधियां तेज होने के साथ दलबदल का सिलसिला भी बढ़ सकता है। 2024 लोकसभा चुनाव के बाद बदले राजनीतिक समीकरण में बीजेपी और सपा-कांग्रेस गठबंधन समेत प्रमुख दल प्रभावशाली नेताओं को अपने पाले में लाने की कोशिश कर सकते हैं। खासकर orc, दलित और क्षेत्रीय प्रभाव रखने वाले नेताओं की भूमिका अहम हो सकती है। हालांकि, किसी नेता को पार्टी में शामिल करना जीत की गारंटी नहीं है। उसका वास्तविक प्रभाव इस बात से तय होगा कि वह अपने व्यक्तिगत प्रभाव के साथ पार्टी को कितने नए सामाजिक समूहों और क्षेत्रों तक पहुंच दिला पाता है।
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