US-Middle East News: अमेरिका ने मिडिल ईस्ट में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा दी है। तीसरे एयरक्राफ्ट कैरियर स्ट्राइक ग्रुप और हजारों अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती से ईरान पर दबाव बढ़ने की आशंका है। ऐसे में सवाल है कि अमेरिका की रणनीति क्या है, खाड़ी देश इस तनाव में कहां खड़े हैं और इसका असर तेल से लेकर वैश्विक अर्थव्यवस्था तक कैसे पहुंच सकता है?
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ता दिखाई दे रहा है। इसी बीच अमेरिका ने मिडिल ईस्ट में अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाने का फैसला किया है। रिपोर्टों के मुताबिक, करीब 9,000 से 10,000 अतिरिक्त सैनिकों और तीसरे एयरक्राफ्ट कैरियर स्ट्राइक ग्रुप को क्षेत्र की ओर भेजा जा रहा है। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब वॉशिंगटन और तेहरान के बीच बातचीत को लेकर भी गतिरोध बना हुआ है।
अमेरिका का सैन्य जमावड़ा कितना बड़ा है?
अमेरिकी तैनाती में एयरक्राफ्ट कैरियर, युद्धपोत, मरीन और दूसरे सैन्य संसाधन शामिल हैं। रिपोर्टों के अनुसार, USS Theodore Roosevelt के नेतृत्व वाला कैरियर स्ट्राइक ग्रुप और USS Makin Island एम्फीबियस रेडीनेस ग्रुप क्षेत्र की ओर बढ़ रहे हैं। इससे मिडिल ईस्ट में अमेरिकी सैन्य क्षमता और बढ़ने वाली है। अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका की योजना में तीन एयरक्राफ्ट कैरियर और दो लैंडिंग ग्रुप शामिल हैं। इस पूरी तैनाती को नवंबर तक पूरा किए जाने की बात सामने आई है। यानी मामला केवल कुछ अतिरिक्त सैनिक भेजने तक सीमित नहीं है। अमेरिका समुद्र, हवा और जमीन—तीनों स्तरों पर अपनी सैन्य क्षमता मजबूत कर रहा है।
US-Middle East News: क्या अमेरिका सच में ईरान को घेर रहा है?
यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा सवाल है। ईरान के आसपास अमेरिकी सैन्य संसाधनों की बढ़ती मौजूदगी को देखते हुए इसे तेहरान पर सैन्य दबाव बढ़ाने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। अमेरिका के लिए इसका एक मकसद ईरान के खिलाफ संभावित सैन्य कार्रवाई की स्थिति में ज्यादा विकल्प तैयार रखना हो सकता है। दूसरा मकसद ईरान को यह संकेत देना हो सकता है कि जरूरत पड़ने पर अमेरिका तेजी से सैन्य कार्रवाई करने की स्थिति में है। रॉयटर्स के मुताबिक, जनवरी से ही अमेरिका ने ईरान के आसपास अपनी सैन्य क्षमता बढ़ानी शुरू कर दी थी और उस समय भी अमेरिकी अधिकारियों ने इसे ईरान के खिलाफ संभावित सैन्य कार्रवाई की क्षमता बढ़ाने से जोड़ा था।
अमेरिका आखिर ईरान पर इतना दबाव क्यों बढ़ा रहा है?
इस पूरे घटनाक्रम को केवल युद्ध की तैयारी के तौर पर देखना अधूरा होगा। इसके पीछे दबाव और बातचीत- दोनों की रणनीति भी हो सकती है। अमेरिका सैन्य ताकत दिखाकर ईरान को अपने पक्ष में समझौते के लिए मजबूर करने की कोशिश कर सकता है। खासतौर पर परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दे इस तनाव के केंद्र में हैं। लेकिन दूसरी तरफ सैन्य जमावड़ा किसी संभावित संघर्ष की स्थिति में अमेरिकी विकल्प भी बढ़ाता है।
US-Middle East News: स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
इस पूरे तनाव का सबसे संवेदनशील केंद्र स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज है। यह फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ने वाला बेहद महत्वपूर्ण समुद्री रास्ता है।दुनिया के ऊर्जा बाजार के लिए इसका महत्व इसलिए बहुत ज्यादा है क्योंकि बड़ी मात्रा में तेल और गैस इसी रास्ते से होकर अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचती है। ईरान और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ने पर इस समुद्री रास्ते की सुरक्षा सबसे बड़ी चिंता बन जाती है।
हाल के घटनाक्रम में हॉर्मुज से गुजरने वाले एक सुपरटैंकर को अज्ञात प्रोजेक्टाइल से नुकसान पहुंचने की भी रिपोर्ट सामने आई है। यही वजह है कि अमेरिका के लिए यहां नौसैनिक मौजूदगी केवल ईरान पर दबाव बनाने का मामला नहीं, बल्कि समुद्री आवाजाही और ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा से भी जुड़ा है।

खाड़ी के देश सबसे ज्यादा मुश्किल में क्यों हैं?
सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर और कुवैत जैसे देशों के लिए स्थिति बेहद जटिल है। एक तरफ उनकी सुरक्षा व्यवस्था लंबे समय से अमेरिकी सैन्य मौजूदगी से जुड़ी रही है। दूसरी तरफ अगर अमेरिका और ईरान के बीच सीधा सैन्य टकराव बढ़ता है तो इन देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकाने और तेल प्रतिष्ठान ईरानी जवाबी कार्रवाई के संभावित निशाने बन सकते हैं। यानी खाड़ी देशों के सामने दोहरी चुनौती है- अमेरिका के साथ सुरक्षा संबंध बनाए रखना और ईरान के साथ सीधे टकराव से बचना। इसी वजह से क्षेत्रीय देश सैन्य टकराव के बजाय कूटनीतिक रास्ते को भी महत्व दे रहे हैं।
US-Middle East News: ईरान के पास क्या विकल्प हैं?
ईरान के लिए अमेरिकी सैन्य जमावड़े का सीधा जवाब देना जोखिम भरा हो सकता है, लेकिन तेहरान के पास कई सैन्य और रणनीतिक विकल्प मौजूद हैं। ईरान मिसाइल और ड्रोन क्षमता के साथ-साथ समुद्री क्षेत्र में असममित युद्ध की रणनीति का इस्तेमाल कर सकता है। हॉर्मुज जैसे समुद्री मार्ग पर दबाव बढ़ाना भी उसके लिए एक बड़ा रणनीतिक विकल्प माना जाता है। हालांकि ऐसा कोई भी कदम सिर्फ अमेरिका को प्रभावित नहीं करेगा। इससे खाड़ी देशों, वैश्विक शिपिंग और ऊर्जा बाजार पर भी बड़ा असर पड़ सकता है।
तेल महंगा हुआ तो दुनिया पर क्या असर पड़ेगा?
अमेरिका-ईरान तनाव का असर मिडिल ईस्ट की सीमा से बाहर निकलकर सीधे वैश्विक अर्थव्यवस्था तक पहुंच सकता है। अक्टूबर की शुरुआत में अमेरिकी सैन्य तैनाती और ईरान को लेकर बढ़ते तनाव के बीच तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला। रॉयटर्स के मुताबिक, 1 अक्टूबर को ब्रेंट क्रूड करीब 102 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था। अगर हॉर्मुज या दूसरे महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों से तेल की आपूर्ति बाधित होती है तो कच्चे तेल की कीमतें और बढ़ सकती हैं।
इसका असर पेट्रोल-डीजल, परिवहन, महंगाई और उत्पादन लागत पर पड़ सकता है। यानी अमेरिका और ईरान का तनाव सिर्फ दो देशों का सैन्य विवाद नहीं है। इसका असर दुनिया के ऊर्जा बाजार और आम उपभोक्ता की जेब तक पहुंच सकता है।

US-Middle East News: तो आखिर अमेरिका का ‘पूरा खेल’ क्या है?
पूरे घटनाक्रम को तीन स्तरों पर समझा जा सकता है। पहला सैन्य दबाव: अमेरिका अपनी ताकत बढ़ाकर ईरान को यह संकेत दे रहा है कि जरूरत पड़ने पर उसके पास सैन्य विकल्प मौजूद हैं। दूसरा रणनीतिक दबाव: इतनी बड़ी तैनाती ईरान को बातचीत और संभावित समझौते के लिए दबाव में ला सकती है। तीसरा संकट की स्थिति में तैयारी: अगर कूटनीति विफल होती है और सैन्य टकराव बढ़ता है तो अमेरिका पहले से तैयार सैन्य ढांचे का इस्तेमाल कर सकता है।
यही वजह है कि मौजूदा अमेरिकी सैन्य जमावड़े को केवल “युद्ध की तैयारी” कहना भी जल्दबाजी होगी और इसे केवल “दिखावे की रणनीति” मानना भी सही नहीं होगा। उपलब्ध घटनाक्रम यह जरूर दिखाता है कि वॉशिंगटन ने ईरान को लेकर अपने सैन्य विकल्पों को काफी मजबूत किया है।
आगे क्या हो सकता है?
अब सबसे अहम सवाल यह है कि सैन्य दबाव बातचीत का रास्ता खोलता है या टकराव को और बढ़ाता है। अगर अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत आगे बढ़ती है तो यह सैन्य जमावड़ा दबाव बनाने की रणनीति साबित हो सकता है। लेकिन अगर बातचीत विफल होती है और दोनों पक्ष सैन्य रास्ते पर आगे बढ़ते हैं, तो हॉर्मुज, खाड़ी के अमेरिकी ठिकाने और ऊर्जा प्रतिष्ठान पूरे संकट के सबसे संवेदनशील केंद्र बन सकते हैं।









