Charan Singh Farmers Messiah: चौधरी चरण सिंह भारतीय राजनीति में किसानों की आवाज के तौर पर हमेशा याद किए जाएंगे। एक सामान्य किसान परिवार में जन्मे चौधरी चरण सिंह ने अपनी मेहनत और राजनीतिक समझ के दम पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से लेकर देश के प्रधानमंत्री तक का सफर तय किया। उन्होंने अपना पूरा राजनीतिक जीवन किसानों, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कृषि सुधारों के लिए समर्पित किया। उनकी राजनीतिक विरासत आज भी कायम है। उनके पोते जयंत चौधरी वर्तमान में केंद्र सरकार में मंत्री हैं और राष्ट्रीय लोकदल का पश्चिमी उत्तर प्रदेश में प्रभाव बना हुआ है।
Charan Singh Farmers Messiah: किसान परिवार में हुआ जन्म-
चौधरी चरण सिंह का जन्म 23 दिसंबर 1902 को तत्कालीन मेरठ जिले के नूरपुर गांव में एक मध्यमवर्गीय किसान परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम मीर सिंह और मां का नाम नेतर कौर था। उनका बचपन ग्रामीण परिवेश में बीता और खेती-किसानी से जुड़े परिवार ने उनके विचारों को गहराई से प्रभावित किया। यही वजह रही कि आगे चलकर उन्होंने किसानों के अधिकार और कृषि सुधार को अपनी राजनीति का केंद्र बनाया।
Charan Singh Farmers Messiah: मेरठ से पढ़ाई, गाजियाबाद से शुरू की राजनीति-
चौधरी चरण सिंह ने मेरठ से अपनी शिक्षा पूरी की। उन्होंने विज्ञान में स्नातक, कला में स्नातकोत्तर और कानून की पढ़ाई की थी। 1929 में कांग्रेस के पूर्ण स्वराज्य के आह्वान के बाद उन्होंने गाजियाबाद में कांग्रेस कमेटी के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके बाद वे धीरे-धीरे स्वतंत्रता आंदोलन और सक्रिय राजनीति में आगे बढ़े।
नमक कानून तोड़ा और छह महीने जेल में रहे-
1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान चौधरी चरण सिंह हिंडन नदी के किनारे नमक बनाने पहुंचे। इसके चलते उन्हें छह महीने की जेल हुई। जेल से बाहर आने के बाद वे स्वतंत्रता आंदोलन में और सक्रिय हो गए। उनका मानना था कि किसान मजबूत होगा तभी देश की अर्थव्यवस्था मजबूत हो सकती है।
1937 में पहली बार विधायक बने-
1937 में चौधरी चरण सिंह संयुक्त प्रांत यानी वर्तमान उत्तर प्रदेश की विधानसभा के सदस्य चुने गए। इसके बाद उन्होंने किसानों के शोषण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर लगातार आवाज उठाई। वे जमींदारी व्यवस्था के खिलाफ थे और किसानों को जमीन का अधिकार दिलाने के पक्षधर रहे। उत्तर प्रदेश में भूमि सुधारों को लागू कराने में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
नेहरू की नीतियों का किया खुलकर विरोध-
1959 के नागपुर कांग्रेस अधिवेशन में चौधरी चरण सिंह ने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की समाजवादी और सामूहिक कृषि नीतियों का सार्वजनिक रूप से विरोध किया। इस विरोध के बाद वे राष्ट्रीय राजनीति में चर्चा में आए और उत्तर भारत के किसान समुदाय के बीच उनकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ी।
1967 में बने यूपी के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री-
चौधरी चरण सिंह ने 1967 में कांग्रेस से अलग होकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में नया अध्याय शुरू किया। 3 अप्रैल 1967 को उन्होंने पहली बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। इसके बाद 18 फरवरी 1970 को वे दूसरी बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने किसानों के हित में कई फैसले लिए। खाद पर सेल्स टैक्स हटाने और किसानों को जमीन का मालिकाना हक दिलाने जैसे मुद्दों पर उन्होंने जोर दिया।
इमरजेंसी में जेल गए, फिर बने गृह मंत्री-
1975 में देश में इमरजेंसी लागू होने के दौरान चौधरी चरण सिंह को भी जेल जाना पड़ा। 1977 में कांग्रेस की हार के बाद केंद्र में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनी। मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली सरकार में चौधरी चरण सिंह उपप्रधानमंत्री और गृह मंत्री बने। बाद में उन्होंने वित्त मंत्रालय की जिम्मेदारी भी संभाली।
नाबार्ड की स्थापना और किसानों के लिए कई फैसले-
1979 में वित्त मंत्री और उपप्रधानमंत्री रहते हुए चौधरी चरण सिंह ने राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (NABARD) की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने खाद और डीजल की कीमतों को नियंत्रित करने, कृषि मशीनों पर टैक्स कम करने और कृषि जिंसों की अंतरराज्यीय आवाजाही से जुड़ी पाबंदियां हटाने जैसे कदम भी उठाए।
28 जुलाई 1979 को बने देश के प्रधानमंत्री-
मोरारजी देसाई सरकार गिरने के बाद चौधरी चरण सिंह 28 जुलाई 1979 को भारत के प्रधानमंत्री बने। हालांकि, कांग्रेस ने बाद में अपना समर्थन वापस ले लिया। वह संसद में बहुमत साबित नहीं कर सके और महज कुछ ही समय में प्रधानमंत्री पद छोड़ना पड़ा। उनका प्रधानमंत्री कार्यकाल बेहद छोटा रहा, लेकिन भारतीय राजनीति में उनका किसान नेता के रूप में प्रभाव लंबे समय तक कायम रहा।
जमींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार में बड़ी भूमिका-
चौधरी चरण सिंह ने उत्तर प्रदेश में जमींदारी उन्मूलन और भूमि सुधारों को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई। 1952 में जमींदारी उन्मूलन कानून लागू होने के बाद बड़ी संख्या में किसानों को जमीन पर अधिकार मिला। इसके बाद चकबंदी और भूमि संरक्षण से जुड़े कानूनों के जरिए खेती और भूमि व्यवस्था में सुधार की कोशिश की गई।
पटवारियों के खिलाफ लिया सख्त फैसला-
जमींदारी व्यवस्था खत्म होने के बाद किसानों की जमीन से जुड़े विवादों को लेकर भी शिकायतें सामने आती थीं। चौधरी चरण सिंह ने पटवारियों पर सख्ती दिखाई। बताया जाता है कि बड़ी संख्या में पटवारियों ने सामूहिक इस्तीफा दिया, जिसे स्वीकार कर उनकी जगह नए लेखपालों की भर्ती की गई।
किसान बनकर थाने पहुंचे चौधरी चरण सिंह-
चौधरी चरण सिंह से जुड़ा एक चर्चित किस्सा यह भी है कि 1979 में प्रधानमंत्री रहते हुए वे किसान के भेष में उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के ऊसराहार थाने पहुंचे। कहा जाता है कि वहां पुलिसकर्मियों द्वारा रिश्वत मांगने और शिकायत दर्ज करने में लापरवाही पाए जाने के बाद उन्होंने पूरे थाने के खिलाफ कार्रवाई की।
किताबों के शौकीन थे, क्रिकेट और फिल्मों से थी नाराजगी-
चौधरी चरण सिंह को किताबें पढ़ने का काफी शौक था। उन्होंने जमींदारी उन्मूलन, भारत की गरीबी और किसानों से जुड़े कई विषयों पर किताबें भी लिखीं। वहीं, क्रिकेट और फिल्मों को लेकर उनकी राय काफी अलग थी। वे क्रिकेट की लंबी कमेंट्री और फिल्मों को लेकर अक्सर आलोचनात्मक रुख रखते थे।
29 मई 1987 को हुआ निधन-
चौधरी चरण सिंह का 29 मई 1987 को 84 वर्ष की उम्र में नई दिल्ली में निधन हो गया। उनके निधन के बाद उनके बेटे अजीत सिंह ने उनकी राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाया। अब उनके पोते जयंत चौधरी इस राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। किसानों की आवाज और कृषि सुधारों के लिए चौधरी चरण सिंह का योगदान भारतीय राजनीति के इतिहास में आज भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
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