Cancer treatment news: कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली एबेमासिक्लिब और रिबोसिक्लिब जैसी दवाओं पर सालाना लाखों रुपये खर्च हो सकते हैं। केरल हाईकोर्ट ने पेटेंट कानून की धारा 100 के तहत सरकार के अधिकारों को स्पष्ट किया है। इससे महंगी दवाओं को मरीजों तक किफायती कीमत पर पहुंचाने का रास्ता खुल सकता है, लेकिन फिलहाल राहत मिलना सरकार के फैसले पर निर्भर करेगा।
कैंसर की दवाओं पर सालाना 8-10 लाख रुपये खर्च क्यों?
कैंसर का इलाज केवल ऑपरेशन या कीमोथेरेपी तक सीमित नहीं होता। कुछ मरीजों को बीमारी के प्रकार और अवस्था के आधार पर लंबे समय तक विशेष दवाएं भी लेनी पड़ती हैं। एबेमासिक्लिब और रिबोसिक्लिब ऐसी ही दवाएं हैं, जिनका इस्तेमाल कुछ प्रकार के स्तन कैंसर के इलाज में किया जाता है। ये दवाएं कैंसर कोशिकाओं की वृद्धि से जुड़ी CDK4/6 गतिविधि को रोकने में मदद करती हैं। हालांकि, हर कैंसर मरीज को इन दवाओं की जरूरत नहीं होती। इनका इस्तेमाल डॉक्टर बीमारी की स्थिति और मरीज की जरूरत के आधार पर तय करते हैं।
समस्या तब सामने आती है, जब इलाज के लिए जरूरी दवाओं की कीमत परिवार की आर्थिक क्षमता से बाहर हो जाती है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, रिबोसिक्लिब के एक मरीज को 21 दिन के कोर्स के लिए करीब 58 हजार रुपये खर्च करने पड़ रहे थे। इस तरह लंबे समय तक इलाज जारी रखना परिवारों पर भारी आर्थिक बोझ डाल सकता है।
Cancer treatment news: महंगी दवाओं के कारण मरीजों के सामने क्या चुनौती है?
कैंसर का इलाज पहले से ही महंगा हो सकता है। इसमें जांच, अस्पताल, ऑपरेशन, कीमोथेरेपी और दूसरी दवाओं का खर्च भी शामिल होता है। ऐसे में किसी एक पेटेंट वाली दवा पर हर महीने हजारों रुपये खर्च करना मरीज और उसके परिवार के लिए मुश्किल पैदा कर सकता है। कुछ परिवार इलाज के लिए बचत खर्च करते हैं, कर्ज लेते हैं या अपनी संपत्ति तक बेचने को मजबूर हो सकते हैं। आर्थिक परेशानी के कारण इलाज तक पहुंच प्रभावित होने की आशंका भी रहती है।
हालांकि, महंगी दवाओं के कारण कितने मरीज इलाज नहीं करा पाते या कितनी मौतें होती हैं, इसका सटीक आकलन करने के लिए विश्वसनीय आंकड़े जरूरी हैं। केरल हाईकोर्ट ने भी सरकार से दवाओं की उपलब्धता और उनकी कीमत वहन कर पाने की स्थिति से जुड़े आंकड़े जुटाने की जरूरत पर जोर दिया।
क्या है पेटेंट कानून की धारा 100?
धारा 100, पेटेंट अधिनियम 1970 का हिस्सा है। इसके तहत केंद्र सरकार को किसी पेटेंट किए गए आविष्कार का सरकारी उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल करने या किसी अन्य व्यक्ति को ऐसा करने के लिए अधिकृत करने का अधिकार मिलता है। दवाओं के मामले में इसका महत्व इसलिए है क्योंकि किसी दवा पर पेटेंट होने से उसके निर्माण और बिक्री पर पेटेंट धारक के विशेष अधिकार हो सकते हैं। ऐसे में दूसरी कंपनी सामान्य तौर पर संबंधित पेटेंट अधिकारों की अनुमति के बिना उसी दवा का उत्पादन नहीं कर सकती।
लेकिन धारा 100 के तहत सरकार कुछ परिस्थितियों में पेटेंट धारक की अनुमति के बिना भी पेटेंट का इस्तेमाल करने की व्यवस्था कर सकती है। केरल हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इसका दायरा केवल सरकारी विभागों के अपने इस्तेमाल तक सीमित नहीं है। सरकार इस प्रावधान के तहत दवा बनवाकर जरूरतमंद मरीजों को गैर-वाणिज्यिक आधार पर बेचने की अनुमति भी दे सकती है।
इसका मतलब यह नहीं है कि पेटेंट अपने आप खत्म हो जाएगा या दवा तत्काल सस्ती हो जाएगी। इसके लिए सरकार को कानूनी प्रावधान का इस्तेमाल करने और आगे की आवश्यक प्रक्रिया पूरी करने का फैसला लेना होगा।
Cancer treatment news: धारा 100 लागू हुई तो मरीजों को क्या फायदा होगा?
अगर केंद्र सरकार इस प्रावधान का इस्तेमाल करने का फैसला करती है, तो वह किसी अधिकृत निर्माता के जरिए पेटेंट वाली दवा का उत्पादन और गैर-वाणिज्यिक आधार पर आपूर्ति कराने का रास्ता अपना सकती है। इससे दवा की उपलब्धता बढ़ाने और मरीजों की जेब पर पड़ने वाला बोझ कम करने की संभावना बन सकती है। हालांकि, वास्तविक कीमत कितनी कम होगी, कितने मरीजों को दवा मिलेगी और इसकी आपूर्ति किस व्यवस्था के तहत होगी, यह सरकार की नीति और उसके क्रियान्वयन पर निर्भर करेगा। यहां एक अहम बात यह भी है कि सस्ती दवा उपलब्ध कराने का अर्थ पेटेंट धारक को बिना किसी मुआवजे के छोड़ देना नहीं है। कानून के तहत पेटेंट के इस्तेमाल और उचित पारिश्रमिक से जुड़े प्रावधान भी प्रासंगिक होंगे।

क्या फार्मा कंपनियों को नुकसान होगा?
इस मामले में पेटेंट धारक कंपनियों के हितों और मरीजों की दवा तक पहुंच के बीच संतुलन का सवाल भी उठता है। फार्मा कंपनियों का तर्क है कि नई दवाओं के अनुसंधान और विकास पर भारी निवेश होता है। पेटेंट से मिलने वाले अधिकार कंपनियों को उस निवेश की भरपाई करने और नई दवाओं के विकास के लिए प्रोत्साहन देते हैं। दूसरी ओर, मरीजों के हित में काम करने वाले विशेषज्ञों का तर्क है कि अगर किसी जीवनरक्षक दवा की कीमत इतनी अधिक हो कि बड़ी संख्या में जरूरतमंद मरीज उसे खरीद ही न सकें, तो सरकार को हस्तक्षेप के उपलब्ध कानूनी विकल्पों पर विचार करना चाहिए।
सरकार अधिकृत उत्पादन और आपूर्ति के जरिए ज्यादा मरीजों तक दवा पहुंचाने की व्यवस्था कर सकती है। लेकिन इससे कंपनियों का मुनाफा निश्चित रूप से बढ़ेगा या घटेगा, यह कहना अभी संभव नहीं है। इसका असर उत्पादन लागत, तय कीमत, मांग, आपूर्ति और पेटेंट धारक को दिए जाने वाले पारिश्रमिक जैसे कारकों पर निर्भर करेगा।
Cancer treatment news: केरल हाईकोर्ट ने क्या फैसला दिया?
केरल हाईकोर्ट ने 28 सितंबर 2026 को जीवनरक्षक पेटेंट वाली दवाओं की अत्यधिक कीमत से जुड़े मामले में धारा 100 की व्याख्या की। मामला मूल रूप से एक स्तन कैंसर मरीज की याचिका से शुरू हुआ था, जिसमें रिबोसिक्लिब की कीमत को लेकर सरकार से हस्तक्षेप की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता की मृत्यु के बाद अदालत ने व्यापक जनहित को देखते हुए मामले की सुनवाई जारी रखी। अदालत ने कहा कि सरकार धारा 100 के तहत पेटेंट वाली दवा का निर्माण कराकर जरूरतमंद मरीजों को गैर-वाणिज्यिक आधार पर उपलब्ध करा सकती है। अदालत ने केंद्र सरकार को दवाओं की कीमत और मरीजों की उन्हें खरीद पाने की क्षमता से जुड़े आंकड़े जुटाने तथा उपलब्ध उपायों का आकलन करने की जरूरत भी बताई।
हालांकि, अदालत ने सरकार को तत्काल इन दवाओं का उत्पादन शुरू करने या उनकी कीमत निश्चित स्तर तक घटाने का सीधा आदेश नहीं दिया। उसने यह निर्णय केंद्र सरकार की नीति और मूल्यांकन पर छोड़ दिया।
Cancer treatment news: मरीजों को सस्ती दवा के लिए कितना इंतजार करना होगा?
फिलहाल यही सबसे अहम सवाल है। अदालत की व्याख्या से सरकार के लिए कानूनी रास्ता स्पष्ट हुआ है, लेकिन इसका लाभ मरीजों तक पहुंचने के लिए सरकारी स्तर पर अगला कदम उठाना जरूरी होगा। सरकार को यह आकलन करना होगा कि संबंधित दवाएं कितनी महंगी हैं, कितने मरीजों को उनकी जरूरत है, मौजूदा मूल्य नियंत्रण और सहायता योजनाएं कितनी प्रभावी हैं तथा धारा 100 का इस्तेमाल करना उचित होगा या नहीं। अदालत ने इसके लिए कोई निश्चित समयसीमा तय नहीं की। इसलिए यह कहना मुश्किल है कि मरीजों को सस्ती दवाएं कब से मिलनी शुरू होंगी।
कैंसर से आगे भी जा सकता है इस फैसले का असर
इस फैसले का महत्व केवल दो कैंसर दवाओं तक सीमित नहीं है। यह पेटेंट वाली उन दूसरी गंभीर बीमारियों की दवाओं को लेकर भी चर्चा का रास्ता खोल सकता है, जिनकी कीमत जरूरतमंद मरीजों की पहुंच से बाहर है। हालांकि, हर दवा के मामले में कीमत, उपलब्धता, पेटेंट की स्थिति और मरीजों की जरूरत का अलग-अलग आकलन करना होगा। धारा 100 का इस्तेमाल अपने आप सभी महंगी दवाओं को सस्ता नहीं कर देगा।
कुल मिलाकर, केरल हाईकोर्ट के फैसले ने महंगी पेटेंट वाली दवाओं को जरूरतमंद मरीजों तक पहुंचाने के लिए सरकार के एक महत्वपूर्ण कानूनी विकल्प को स्पष्ट किया है। लेकिन असली बदलाव इस बात पर निर्भर करेगा कि केंद्र सरकार आंकड़ों के आकलन के बाद इस अधिकार का इस्तेमाल करती है या नहीं।
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